Tuesday, 10 November 2015

रेड लाइट लाइव

रेड लाइट लाइव
घर से निकला ...मेन रोड पर आया तो समझ ही नहीं आया कि कौन किस लेन में चल रहा है ...जैसे तैसे मैं भी उसका हिस्सा बन गया...कट मारती बाइक और बिना इंडिकेटर के लेफ्ट से राइट और राइट से लेफ्ट होते ऑटो...सब देख कर लगा कि सब राम भरोसे है ...जैसे तैसे रेड लाइट पर रूका तो ग्रीन से येल्लों और येल्लो से रेड हो चुकी थी ...गिनती भी 120 से धीरे धीरे नीचे खिसक रही थी ...लेकिन कोई रूक नहीं रहा था ...फिर अचानक ट्रक की एंट्री हुई ...और सब रूक गए और अपने आप जिस लेन की ग्रीन लाइट थी वो चलने लगी ...तो सवाल खड़ा हुआ कि क्या देश कुछ ऐसे ही चलता है जहां जो जितना ताकतवर...लोगों के बीच उसका डर भी उतना ही ज्यादा ...जिसे वजूद कहा जाता है ...बहरहाल अचानक गाड़ी के बंद शीशे पर कुछ जोर से लगने की आवाज आई ....देखा तो एक फटे लिबास में महिला के हाथ में बेहोश बच्चे को पाया ...जो सिक्के को शीशे से टकरा रही थी फिर जैसे ही शीशे को नीचे किया उसकी जुबां से सुनाई दिया आज कुछ तो दे दो ....समझ नहीं आया कि क्या ये वो अंधेरा है जो देश से मिटना चाहिए ...या ये धंधा है जिसमें दूध पीता बच्चा उस डमी की तरह है जो शोरूम के बाहर लगी रहती है और ग्राहकों को आकर्षित करती है ...यहां ये बेहोश बच्चा संवेदना जगाने का काम कर रहा था ....बहरहाल कुछ लोगों ने महिला को पैसे दिया तो कुछ ने गालियां ...तो फिर एक और सवाल खड़ा हुआ कि गालियां देश की भाषा का अभिन्न अंग बन गई है या फिर भाषा को अपंग कर चुकी है ....बहरहाल जहन में ये सवाल दौड़ ही रहे थे कि पीछे से अचानक आवाज आई...ए बुढ़िया पीछे हट ...मुड़ कर देखा तो एक बाइक पर दो लड़के थे ...हाथ में हेलमेट था और कान में हैडफोन ...तस्वीर ने सवाल खड़ा किया की क्या हेलमेट जिंदगी बचाने के लिए है या फिर पुलिस वाले से बचाने के लिए ...ये सोच ही रहा था कि एक बार फिर जोर से आवाज आई...सुना नहीं क्या ए बुढ़िया पीछे हट ....ये सुन बुजुर्ग महिला कुछ बुदबुदाते हुए दूसरी गाड़ी की तरफ चल दी ...जाहिर है उसने भी गालियां ही दी थी ...लेकिन इतनी धीरे की लड़के सुन ना सके तो फिर जहन में एक और सवाल दिमाग में कोंदने लगा कि क्या बगावत के लिए हर कोई तैयार है बस मजबूरी यही है कि वो दूसरे से कमजोर है ...खैर तेजी से वो लड़के गाडियों के बीच में से शीशों से टकराते हुए आगे निकल गए और फिर रेड लाइट को क्रॉस कर गए ...इस बीच भी जिनकी ग्रीन लाइट थी वो बंद शीशों में से उन्हे गालियां दे रहे थे ....तो क्या ये समझ लिया जाए कि गालियों के बिना हमारी भाषा अब अधूरी है ...जो भी हो ...अचानक दो छोटे छोटे बच्चे गाड़ी के सामने आए ...दो बार कपड़े को गाड़ी पर घुमाया और फिर शीशे के सामने आकर खड़े हो पैसे मांगने लगे ...ऐसा लग रहा था कि कोई प्रोफेशन मार्केटिंग के बच्चे हैं क्योंकि इस दौरान उनके चेहरे पर रौब था ना ही कोई मजबूरी ...मैने मना किया और उनकी तरफ देखना बंद कर दिया ..वो कुछ देर खड़े रहे और फिर मेरी तरफ देख कर कुछ ऐसी रिएक्शन दी मानो मैने उनका हक मार लिया हो ....अचानक पीछे से जोर जोर से हॉरन बजने लगे ..मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्या हुआ ...और क्या कोई गाड़ियों को उड़ा कर ले जाना चाहता है जो जगह ना होने के बाद भी हॉरन बजा रहा है ...फिर एकदम से मेरी नजर आगे रेड लाइट पर गई जहां उलटी गिनती 10 से नीचे चल रही थी ...और लोगों ने चलना शुरु कर दिया था ...अब समझ ये नहीं आया कि जो लोग 120 सैकण्ड से खड़े थे ..वो 10 सैकण्ड और क्यों नहीं रूक पाए...और क्या सयंम की परिभाषा सिर्फ डंडे के जोर पर बची है ...जैसे तैसे हॉरन के शोर के बीच सब चल दिए ...और ग्रीन वाले जिनकी अब रेड लाइट हो चली थी वो भी रूकने को तैयार नहीं थे और ना ही वो जो हमारी लेन में थे ....जैसे तैसे यहां से आगे बढ़ा तो 2 किलोमीटर के बाद फिर से रेड लाइट दिखाई दी ...और उस पर 60 सैकण्ड खड़े रहने के दौरान फिर से वही सब हुआ ...तो सवाल ये खड़े हुए कि क्या कानून का किसी को डर नहीं है ...और क्या भीख एक मजबूरी है ...जो मजदूरी से आसान लगती है या फिर ये ही आज मजदूरी बन गई है और हर किसी की अपनी रेड लाइट है ...और क्या लोगों की जुबां पर गालियां परेशानी की निशानी है या फिर यहीं जुबान हो चली है ...बहरहाल रेड लाइट भी इतनी लाइव हो सकती है कभी सोचा नहीं था जहां ना जाने कितनी मुर्दा सोच हर वक्त दिखाई देती हैं .....